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Black Money & Corruption

नोटबंदी का प्रभाव: भ्रष्टाचारियों पर नरेंद्र मोदी का बड़ा प्रहार, एक ही दिन में नप गए 87,000 आर्थिक अपराधी

by IRC-ADMIN - Mar 9 2019 1:09PM

इस देश के अंदर आज़ादी के बाद से ही एक ऐसी विचारधारा का जन्म हमने देखा है, जिसने इस देश की आर्थिक स्थिति को बहुत प्रभावित किया है। किसी राष्ट्र के निर्माण के लिए धार्मिक ही नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक मज़बूती की भी आवश्यकता होती है। आम भाषा में 'भ्रष्टाचारी' कही जाने वाली इस विचारधारा ने देश में धीरे-धीरे अपनी जड़ें इतनी जमाई की आज इस मुद्दे को लेकर चुनाव तक जीते जा रहे हैं। दिल्ली में बैठा 'आत्ममुग्ध बौना' इसका एक प्रबल उदाहरण है।
जब इस देश ने आज़ादी पाई, तो कुछ संवैधानिक नियम बनाये गए थे। इन नियमों के अंदर एक नियम यह भी था कि देश के प्रति समर्पित रहना हमारा परम कर्तव्य है। यह एक लिखित जुमले से अधिक कुछ नहीं रह गया। आज़ादी से ले कर अभी तक की स्थितियों को देखें तो पता चलेगा कि देश की आर्थिक नींव पर कितना ज़बरदस्त प्रहार किया गया है। यह आज से नहीं हुआ। हम हमेशा से विदेशी आक्रमणकारी और दमनकारियों के कारण अपनी आर्थिक संपत्ति खोते गए हैं। अफ़ग़ान, मुग़ल, अंग्रेजों के बाद अब एक और ऐसे विदेशी हैं जिनके द्वारा 70 सालों से देश को कभी बोफोर्स घोटाला, कभी 2G घोटाला, कभी कॉमनवेल्थ घोटाला तो कभी ज़मीन घोटाला को कर के हमेशा भारत की तिजोरी पर चपत लगाई गई है। लेकिन ये वो घोटाले थे जो सामने आ गए और इन पर कार्यवाही हुई, लेकिन एक घोटाला ऐसा भी है जो वर्षो से हमारे सामने दिखाई दे रहा है लेकिन आज तक किसी भी सरकार ने उस पर कोई गंभीर कार्यवाही नहीं की है। इस घोटाले का नाम है 'टैक्स घोटाला'
■ क्या है ये टैक्स घोटाला -
हमारे देश के अंदर कर व्यवस्था को ले कर कुछ नियम बनाये गए हैं। देश के संसाधनों का इस्तेमाल करने के लिए हमें देश की सरकार को कुछ रकम टैक्स के रूप में जमा करनी होती है। यह सरकार का अधिकार है। कुछ दशको से जिस प्रकार से टैक्स की चोरी होने लगी, उसने देश की आर्थिक नींव को बहुत बड़ा आघात पहुंचाया। किसी ने अजय देवगन की 'RAID' फ़िल्म देखी होगी तो उन्हें पता होगा कि इंदिरा गांधी के समय से ही किस स्तर पर और किन लोगों द्वारा यह आर्थिक अपराध दोहराया जाता था। इस टैक्स की चोरी ने न केवल देश बल्कि देश के नागरिकों की भी जेब में महंगाई की मार बढ़ा दी थी। इतने सालों में टैक्स की चोरी रोकने के प्रयास करने की बातें तो खूब की गई लेकिन ज़मीन पर कुछ खास दिखाई नहीं दिया था। नब्बे के दशक में तो इस टैक्स चोरी के तार अंडरवर्ल्ड से भी पकड़े गए और बड़े-बड़े नामों को देश को कलंकित करते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया, लेकिन प्रशासनिक कार्यवाही के बाद देश के कानून में 'कमी' की बैसाखियों का सहारा ले कर यह अपराधी छूट गए और कुछ तो आज कल देश की संसद में भी पहुँच गए हैं।
सन 2000 के बाद से इसी टैक्स चोरी का छोटा भाई सामने निकल कर आया जिसको आज हम 'काले धन' के रूप में पुकारते हैं। 2014 के अंदर पता चला कि यह छोटा भाई, बड़े भाई से भी 'बड़ा' बन चुका है और आज कल स्विस बैंक में मज़े काट रहा है। इस बीच बहुत मज़बूत सरकार का दावा करने वाले तत्कालीन हुक्मरानों ने भी बहुत से राजनैतिक पापड़ बेले कि किसी तरह यह खबर दब जाए, लेकिन हर हफ्ते किसी न किसी घोटाले के सामने आ जाने के बाद उसके तार सीधे उसी स्विस बैंक से जुड़ते थे जहाँ पर यह काला धन रखा गया है।
■ 2014 में पलटी बाज़ी -
2014 में 30 साल बाद देश द्वारा दिये गए ऐतिहासिक बहुमत ने यह साबित कर दिया था कि मनमोहन सिंह सरकार के समय हुए घोटालों और भ्रष्टाचार ने जिस स्तर पर देश के अंदर अपनी पैठ बना ली थी, उसको मनमोहन सिंह और कांग्रेस पार्टी की ही 'लापरवाही' समझी गयी। सीधे तौर  पर देखा जाए तो यह हमारे देश के अंदर आज तक की सबसे भ्रष्ट सरकार को भगाने का 'निर्वाचन आयोग' के माध्यम से जनता का एक 'आर्डर' था। हालांकि आज भी वो लोग अपनी हरकतों से सुधरे नहीं है, लेकिन गद्दी सम्हालने वाले नए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस काले धन पर प्रहार करने के अपने वादे को ध्यान में रखते हुए सबसे पहला काम काले धन के खिलाफ SIT का गठन करने का ही लिया। इस निर्णय के बाद यह स्पष्ट हो गया कि देश के अंदर जिस स्तर पर कालेधन को छिपाया गया है, उसके ऊपर अब निर्णायक कदम उठाने का समय आ गया है।
काले धन को खत्म करने के लिए SIT का गठन कर देना ही एकमात्र रास्ता नहीं था। इस भ्रष्टाचार की जड़ अभी भी इसी देश के अंदर मज़बूती से खड़ी थी। मोदी समझ गए कि भले ही वह आज विदेशों के काले धन को खत्म कर दें, लेकिन कल को वहां और धन जमा नहीं होगा, इसकी कोई गारेंटी नहीं है। अतः सबसे पहले इसकी जड़ पर प्रहार करना होगा। वो जड़ जहां से यह धन उत्सर्जित होता है।
■ ऐसे हुई कार्यवाही -
कालेधन की जड़ वही टैक्स चोरी थी जिसको बड़े ही आराम से इस देश में अंजाम दिया जाता रहा। इसी के दम पर बेनामी संपत्तियां बनाई गई। स्विस बैंक में पैसे जमा कराए गए और विदेशों में संपत्तियां खड़ी की गई। PMO दफ्तर के अंदर जब वर्षों पुरानी फाइल्स को खंगाला गया तो पता चला कि हमारे देश के अंदर किस बड़े स्तर पर टैक्स की चोरी हो रही है। हर बढ़ते हुए साल के साथ यह चोरी हमारे राजस्व में हुए घाटे को बढ़ाती ही जा रही थी जिसके कारण देश में 1990 वाले आर्थिक हालात बनते जा रहे थे। देश की अर्थव्यवस्था में धीमी गति कहानी को और साफ कर रही थी।
तय हुआ कि इसके ऊपर कार्यवाही की जाएगी। शुरुआत हुई 'प्रोपर्टी डिक्लेरेशन' से जिसमें सभी नागरिकों को एक तय समय सीमा के अंदर अपनी संपत्ति का ब्यौरा सरकार को देने के लिए कहा गया। इसके बाद इसकी मियाद फिर बढ़ाई गई। अगला बड़ा कदम जन धन खातों को खुलवाना था। देश की अर्थव्यवस्था में रुका हुआ पैसा वापस आये, इसके लिए जन धन खाते बहुत काम आए। लेकिन इसका असली उपयोग 8 नवंबर 2016 के बाद देखने को मिला जब एक ऐतिहासिक निर्णय करते हुए प्रधानमंत्री मोदी द्वारा ₹500 और ₹1000 के नोट 'लीगल टेंडर' की श्रेणी से बाहर कर दिए गए। यहां ध्यान रखिये कि इन सभी कार्यों में देश के विपक्ष ने सरकार को आड़े हाथों लिया और नोटबन्दी के बाद तो जैसे विपक्ष ने तूफान ही खड़ा कर दिया।
■ 2016 के बाद से बदले हालात -
2016 के बाद से जब साल 2017-18 का वित्तीय बजट दिखाया गया तो उसके कुछ आंकड़ों को देख कर हर स्टॉक ब्रोकर से लेकर आर्थिक सलाहकार, हैरान रह गए। इसमें दिखाया गया कि नोटबन्दी के पहले देश भर में जिन कर दाताओं की संख्या मात्र 3 लाख थी, वो नोटबन्दी के पश्चात बढ़कर सीधे दुगनी यानी 6.10 लाख हो गयी है। इस आंकड़े को देख कर सभी राजनैतिक पंडितों के होश फाख्ता हो गए। इसके साथ ही यह भी पता चला कि देश के अंदर किस बड़े स्तर पर टैक्स की चोरी होती थी।
देश की आर्थिक स्थिति पर लगने वाली बड़ी चोट साफ तौर पर नज़र आ रही थी। यह देश के आर्थिक हालातों को न केवल कमज़ोर कर रही थी बल्कि यह देश के लिए एक बड़ी मुसीबत भी बन रही थी। लेकिन इस नोटबन्दी ने कई बड़े अजगरों को छेड़ दिया था। लोकपाल के नाम पर सरकार बना के बैठने वाले बस सड़क पर नहीं नाचे, नहीं तो बाकी हर करम उन्होंने कर दिखाया था। यह बौखलाहट एक और इशारा थी कि देश के केंद्रीय नेतृत्व ने एक सही जगह प्रहार किया है।
■ बेनामी संपत्ति और फ़्यूजिटिव इकनोमिक ऑफेंडर्स बिल -
बड़े निर्णय के बाद दूसरा कार्य था देश के अंदर कानून को मज़बूत करना। पिछले कुछ साल के भीतर ही बेनामी सम्पत्ति एक्ट और इकनोमिक ऑफण्डर्स बिल ने पूरे भ्रष्टाचारी नेक्सस की कमर तोड़ दी थी। देश के अंदर बेनामी संपत्तियों ने जिस काले धन को छुपा रखा था, उसको भी भारत सरकार के अधीन लाया गया। वहीं इस देश में घोटाला कर विदेश भागने वाले भगौड़ों के लिए फ़्यूजिटिव इकनोमिक ऑफण्डर्स बिल ने एक ब्रम्हास्त्र का कार्य किया। यकीन नहीं होता तो एक बार विजय मालया के ट्विटर एकाउंट पर जा कर देख लीजिए, उनकी बुरी हालत उनका ट्वीट ही बताएगा।
■ सख्ती के साथ नरमी का 'कॉकटेल' -
प्रधानमंत्री मोदी की राजनीति और समझ का दीवाना गुजरात पहले से ही रहा है। उनको पता है कि शस्त्र और शास्त्र का प्रयोग कब, कैसे और कहाँ करना है। जहां पिछली सरकारों का एकमात्र लक्ष्य सख्ती के साथ निपटने का बताया जाता है (वो भी नाम मात्र) वहीं प्रधानमंत्री मोदी में सख्ती और नरमी, दोनों का ही एक बेजोड़ समागम दिखाया। दरअसल प्रधानमंत्री मोदी जानते थे कि 70 सालों से भ्रष्टाचार एक 'सिस्टम' बन चुका था। इस सिस्टम के अनुसार न चाहते हुए भी कई लोग इसके भागी बन गए थे, और इसी के अनुसार चलते थे, क्योंकि दूसरा कोई और रास्ता नहीं था। जहां पिछली सरकारों ने 'गेहूं के साथ घुन पिसता है' वाली सोच से कार्यवाही करनी शुरू की थी वहीं प्रधानमंत्री मोदी में यह तय किया कि भारतीय कानून का पालन हर स्तर पर किया जाएगा और भारतीय कानून के 'हर अपराधी को सुधरने का मौका' देने के अंतर्गत एक और मौका दिया गया ताकि वो भी अपना कल भुलाकर एक नई शुरुआत कर नये ईमानदार सिस्टम में शामिल हो सके। इसके लिए उनके ऊपर बड़ी आर्थिक पेनाल्टी लगाकर छोड़ने का भी प्रावधान किया गया, ताकि आज तक हुई गलतियों को भुला वो नए जीवन की शुरुआत कर सके। इसके असर भी साफ दिखाई देने लगा और वर्ष 2018-19 के वित्तीय बजट में कर दाताओं की संख्या में भी भारी इज़ाफ़ा हुआ।
■ नोटबन्दी का नया असर आया सामने -
अब नोटबन्दी का एक नया असर सामने आया है। आयकर विभाग ने करीब 87 हजार ऐसे लोगों पर शिकंजा कस दिया है जिन्होंने नोटबंदी के बाद आयकर विभाग द्वारा जारी किए गए नोटिस का जवाब नहीं दिया था। विभाग ने करीब तीन लाख लोगों को एसएमएस, ईमेल व अन्य माध्यमों से नोटिस भेजा था। अब उन सभी को मूल्यांकन के अधीन होना होगा। केंद्रीय मंत्रालयों की तरफ से वरिष्ठ अधिकारी को जारी की गई अधिसूचना के तहत केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) ने मानक संचालन प्रक्रिया को निर्धारित कर दिया है। इसके बाद इन सभी पर कार्यवाही की जाएगी।
वैसे जानकारी के लिए आपको बताते चलें कि इससे पहले भी इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने लगभग 3 लाख व्यक्तियों को धारा 142 (1) के अंतर्गत नोटिस जारी किए थे। इन नोटिसों में उन्हें कैश जमा करने से संबंधित और 2015-16 के आयकर रिटर्न की जानकारी देने के लिए कहा गया था। इसके बाद इन सभी नोटिसों में 87,000 मामलों के अंदर आयकर विभाग को कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली थी। यह साफ तौर पर 'आपराधिक कृत्य' है। अधिक जानकारी के लिए यहाँ पढ़ें
■ IRC विश्लेषण -
हम जहां देश के अंदर एक स्वस्थ वातावरण चाहते हैं, उसके किये आवश्यक है कि पुरानी गलतियों को सुधारा जाए। इन गलतियों को सुधारने के लिए आवश्यक हो जाता है कि एक सही रोडमैप तैयार किया जाए। 5 सालों से जिस रोडमैप के अंतर्गत प्रधानमंत्री मोदी ने काम किया है, उसके असर साफ दिखाई देने लगे हैं। आने वाले दिनो में आपको एक बड़ा सरप्राइज मिलने वाला है।

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