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बेटी से छेड़खानी का विरोध किया तो करदी पिता की हत्या, इसे 'सैक्युलर' हत्या बता कर मीडिया ने दूसरी बार मार डाला उस पिता को

by IRC-ADMIN - May 14 2019 5:10PM

"महिला का भाई दिल्ली के एक अस्पताल में अपने जीवन के लिए संघर्ष कर रहा है। अभी तक आरोपियों की पहचान नहीं हो पाई है।" - इंडिया टुडे की हैडलाइन दिल्ली में हुई एक घटना की जानकारी दे रही है। दिल्ली आपराधिक घटनाओं के कारण बहुत विवादों में रही है, लेकिन मीडिया द्वारा इस घटना को हेडलाइंस के पीछे जिस प्रकार से छुपाया जा रहा है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है।

कहानी दिल्ली स्थित मोती नगर क्षेत्र के बसई दारापुर की है। यहां एक व्यक्ति की चाकू घोंप कर हत्या कर दी गयी। मृतक की पहचान 51 वर्षीय धुव राज त्यागी के रूप में हुई है। यह निर्मम घटना उस बात को ले लर हुई, जिसे सभ्य समाज कभी स्वीकार नहीं कर सकता है। उनकी हत्या छेड़छाड़ का विरोध करने के लिए हुई। गौरतलब है कि मृतक त्यागी की बेटी से छेड़छाड़ किए जाने के बाद वह आगबबूला हो गए। कोई भी होगा। आने घर की इज़्ज़त पर इस प्रकार की नज़र डालने वालों को कोई भी शरीफ व्यक्ति स्वीकार नहीं करेगा, लेकिन कातिलों का क्या? वो कातिल जो विक्षिप्त मानसिकता के साथ सरेआम सड़कों पर दौड़ते हैं।

इस मामले में पुलिस ने 2 नाबालिगों समेत 4 लोगों को गिरफ्तार किया है। चारों ही एक ही विशेष समुदाय से आते हैं। 2 आरोपियों नाम है मोहम्मद आलम और जहांगीर खान। यहां हम किसी धर्म विशेष को निशाना नहीं बना रहे, लेकिन उस पत्रकारिता का विरोध करना ज़रूरी है जो एक धर्म विशेष के आरोपियों को हेडलाइंस के पीछे छुपाने के प्रयास करते हैं।

पुलिस रिपोर्ट के अनुसार ध्रुव त्यागी अपने परिवार के साथ बसई दारापुर में रहा करते थे। रविवार रात को वज अपनी बेटी और अपने बेटे के साथ अस्पताल से लौट रहे थे। घर पहुंचने से कुछ दूर पहले ही पांच-छह लोगों द्वारा उनका रास्ता रोका गया। यहीं से विवाद पनप गया। जहांगीर और आलम समेत उसके कुछ गुर्गे साथियों ने रास्ता देने से मना कर दिया। समय को देखते हुए ध्रुव में अपनी बेटी को घर पहुंचाना बेहतर समझा। उसके बाद वो वहाँ से लौटकर वापस आये। वो छेड़खानी कर रहे लड़कों की शिकायत करने के लिए बाहर आये। वो इनकी शिकायत के लिए इनके घर गए जहाँ इन पर लाठी-डंडों और चाकू तथा धारदार हथियार से वार किया गया। इसी में बीच-बचाव करने गए उनके बेटे अनमोल पर भी धारदार हथियार से हमला किया गया। उस पर चाकुओं से वार किया गया। अब आप सोच कर देखिये की कैसे इन अपराधियों के हौसले बुलंद थे।

इस इलाके में मुसलमानों की अच्छी खासी जनसंख्या है। मामला दो समुदायों से जुड़ा हुआ है इसलिए इलाके में तनाव का माहौल है। भारी सुरक्षाबल की तैनाती इन इलाकों में कर दी गयी है। यह भी देखा जा रहा है कि वहां के लोगों के बीच इस घटना को ले कर बहुत गुस्सा है। इस घटना के बाद नाबालिग अपराधियों को ऑब्जर्वेशन सेल में भेजा गया है। लेकिन क्या नाबालिग होने के नाम पर उनके द्वारा की गई एक मासूम व्यक्ति की हत्या छुपाई जा सकती है?
इसी बीच वहां पुलिस ने आईपीसी 302 (हत्या), 506 (आपराधिक धमकी) और 509 (महिला का अपमान) के तहत केस दर्ज कर पड़ोसी मोहम्मद आलम (20 साल) और जहाँगीर खान (45 साल) को गिरफ़्तार कर लिया है। ये घटना मोती नगर पुलिस स्टेशन की है जहां यह केस दर्ज हुआ है। अनमोल की हालत अभी भी गंभीर बनी हुई है। वह मृत्यु और जीवन के बीच संघर्ष कर रहा है। कितना दुर्भाग्यपूर्ण है।

आप सोच कर देखिये की स्थितियां कितनी भयावह हैं। बहुसंख्यक होने के बाद अपराध को अपना धंधा बना लेने वाले ऐसे लोग कितने निडर हैं। ऐसा कई मामलों में देखा गया है कि अपराधी अपराध का विरोध करने पर आसपास से अपने ही समुदाय के लोगों को सहायता के लिए बुला लेते हैं। घटना के बाद मीडिया द्वारा भी लीपापोती का प्रयास होता है। वही इस घटना में भी हो रहा है। अपराधियों के नाम छुपाए जा रहे हैं। इसको एक आम घटना का रूप दिया जा रहा है। स्थितिया ये हो चुकी हैं कि अब परिवार वालों को सोशल मीडिया पर अपनी आवाज़ उठानी पड़ रही है।

देश के अंदर असहिष्णुता का माहौल बताने वाले लिबरल और मीडिया वाले इस घटना पर चुप हैं। कोई बॉलीवुड का कलाकार प्लेकार्ड नहीं निकाल रहा है। क्या हिंदुओं के प्राणों का कोई मूल्य नही है। क्या कारण है कि ऐसी घटना हो जाने के बाद भी यह लोग चुप है। इस प्रकार की चुप्पी को हम अपराध को बौद्धिक स्वीकृति न कहें तो क्या कहें, आप खुद बताएं?

क्या समाज में अब हिंदुओं को भयभीत होकर रहना पड़ेगा? इस प्रकार की घटना को जिस तरह से सामान्य रंग देकर दबाने का प्रयास हो रहा है, और देश के सेक्यूलर नेताओं द्वारा चुप्पी साध ली गई है, वह इनकी दोगली नियत की पूरी पोल खोल रही है। आप खुद ही सोच कर देखें कि ऐसे लोगों को सलाखों के पीछे किए जाने के बाद भी इनके नामों को छुपाया जा रहा है। वहीं दूसरी तरफ यदि किसी दो समुदाय के बीच में ऐसी घटना हो और हत्यारा हिंदू निकले तो उसके नाम पर असहिष्णुता का राग अलापा जाता है। उसके नाम को हाईलाइट करके दिखाया जाता है। क्या हम इसको एक संप्रदाय के विरुद्ध बौद्धिक जिहाद ना समझे? अभी पिछले दिनों कमल हसन को नाथूराम गोडसे में देश का पहला हिंदू आतंकवादी दिखाई दिया था। इस घटना पर कमल हसन चुप हैं। उनके लिए यह सामान्य घटना है। आखिरकार यह दोगली विचारधारा कब तक चलेगी? कहीं ना कहीं तो हमें एक साथ खड़े होकर स्टैंड लेना पड़ेगा। लेकिन हमारा समाज तो ऐसी घटनाओं का वीडियो बनाने में ही व्यस्त है। परिवार वालों ने बताया कि जब यह आपराधिक घटना अपने अंजाम तक पहुंच रही थी तब वहां खड़े लोगों ने परिवार के किसी भी सदस्य को बचाया नहीं, उल्टा उनका वीडियो बनाने लगे। यह तो पूर्णतया संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। देशभर में दिल्ली इन्हीं घटनाओं के कारण बदनाम है। दिलवालों की दिल्ली कही जाने वाली दिल्ली के लोगों के अंदर क्या संवेदनहीनता घर कर गई है। आखिर उनकी संवेदना कहां चली गई है कि वह ऐसी घटनाओं में भी एक प्रकार का एडवेंचर ढूंढते हैं। मूकदर्शक बनकर इस अपराधी घटना को देख रहे लोग इसमें उतने ही जिम्मेदार हैं। मरी हुई कौमें कभी समाज का भला नहीं कर सकती। क्या यही आज के समाज की सच्चाई है?

इस परिवार के ऊपर से जिस प्रकार एक बाप का साया उठ गया, उसके जिम्मेदार लोगों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए। यहां हमारे समुदाय को भी सोचने की आवश्यकता है कि आखिर उनकी एकता की कमी किस प्रकार से उनको निगलती जा रही है। यह कोई सामान्य आपराधिक घटना नहीं है। अगर होती तो इलाके में इतना सैन्य बल लगाने की आवश्यकता ना पड़ती। यह शुद्ध रूप से एक सांप्रदायिक घटना है। इलाके में बना हुआ तनाव का माहौल रोका जा सकता था यदि उन अपराधियों की अपराधिक गतिविधियों को पहले पकड़ लिया जाता। उनके परिवार द्वारा उन पर ध्यान ना दिया जाना इसका मुख्य कारण है, लेकिन इस एक तथ्य को लेकर आप उनके आपराधिक घटना को छुपा नहीं सकते। कम पढ़ा लिखा होना, गरीब होना, यह सिर्फ अपराधियों को बचाने के तरीके होते हैं। असल सच्चाई यह होती है कि उनके दिमाग में अपराध भरा हुआ होता है। इस प्रकार की नीच हरकत करने के बाद भी वह जैसे बचाये जा रहे हैं, यह हमारे समाज को दिया जा रहा 'सेक्युलर संकेत' है। जब तक आप ऐसे ही चुप रहेंगे, ऐसी घटनाएं निरंतर होती रहेंगी। इसके खिलाफ आवाज उठाने का यही समय है। फिलहाल हम यही चाहेंगे कि इलाके में तनाव का माहौल खत्म हो। यह देश और समाज दोनों के लिए बढ़िया नहीं है। लेकिन यदि इसके विरुद्ध कोई आवाज उठाता है तो जिन लोगों ने आज इस घटना पर चुप्पी साध रखी है, वहीं सड़कों पर प्ले कार्ड और बैनर लेकर निकल पड़ेंगे। अवार्ड वापसी वाले फिर से अपना "अवॉर्ड फेंको" प्रतियोगिता शुरू कर देंगे। इसी को हम बौद्धिक आतंकवाद कहते हैं।

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