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यदि आप अभी भी 'रोज़गार के आंकड़ों' पर मीडिया द्वारा चलाये भ्रामिक प्रचार से प्रभावित हैं तो आपको यह अवश्य पढ़ना चाहिए

by IRC-ADMIN - Feb 8 2019 8:00AM

देश के अंदर रोज़गार को ले कर कई सर्वेक्षणों का हवाला देकर यह बताया जा रहा है कि देश के अंदर बेरोज़गारी अपनी उछाल पर है। इसके ऊपर तीन तरह के नैरेटिव है। पहला यह कहता है कि देश के अंदर रोज़गार बिल्कुल नहीं है। दूसरा ठीक इसके विपरीत यह कहता है कि नौकरियां कोई बड़ी समस्या नहीं हैं। तीसरा इन दोनों के बीच की धुरी है जो कहती है कि नौकरियां पर्याप्त हैं, परंतु गुणवत्ता वाली नौकरियों का सृजन करना एक बड़ी चुनौती है। इन्हीं सब के बीच पीरियोडिक लेबर फ़ोर्स सर्वे (PLFS) के आंकड़ों पर बहुत बात की जा रही है। एक धारणा बनाई गई है कि इसके निष्कर्ष पिछले 'रोज़गार-बेरोज़गारी सर्वेक्षण (EUS)' की तुलना में भारत की बेरोज़गारी में एक बड़ा उछाल दिखाते हैं। यह आखिरी बार 2011-12 के दौरान सम्पन्न किया गया था। यह PLFS पिछले EUS के सर्वेक्षणों से एकदम अलग है और इसकी तुलना इतनी आसानी से नहीं कि जा सकती है। 

दरअसल PLFS जुलाई 2017 में शुरू किया गया था। यह दो साल का पायलट प्रोजेक्ट है जिसमें एक त्रैमासिक शहरी और वार्षिक ग्रामीण सर्वेक्षण शामिल हैं। इसका उद्देश्य श्रम बाज़ार पर लगातार अधिक डेटा जुटाना है। यही कारण रहा कि यह पिछले EUS से बाहर कर दिया गया, जो हर पाँच साल में एकबार होता है। इसके साथ ही PLFS ने अपनी सैंपलिंग तकनीक अपडेट किया है जो 2011 की हुई जनगणना से एकदम भिन्न सैंपल है जिसमें डेटा कलेक्शन का भी तरीका भिन्न है।

देखा जाए तो 2011-12 के सर्वेक्षण के आंकड़ों के साथ तुलना के आधार पर नौकरी में कमी का यह निष्कर्ष दोषपूर्ण है। दरअसल रोज़गार के आंकड़ों के अलावा यह सर्वेक्षण देश में कुल जनसंख्या का अनुमान जैसे बुनियादी जनसांख्यिकीय डेटा भी प्रस्तुत करता है। PLFS का अनुमान है कि 2017-18 में भारत की कुल जनसंख्या EUS 2011-12 से कम होगी। यानी दोनों ही सर्वेक्षणों में एक विरोधाभास दिखाई देता है। एक समय के लिए हम यह तुलना स्वीकार भी करते हैं, तब भी इसका सीधा सा मतलब होगा कि पिछले 6 साल में देश की जनसंख्या में भारी गिरावट आई है। अगर कोई दोनों सर्वेक्षणों के बारे में यह सोचता है कि दोनों की कार्यप्रणाली और कवरेज समान थी, तब भी जनसंख्या में गिरावट का कोई ठोस कारण स्पष्ट नहीं होता है। वहीं दूसरी तरफ अनुमानित जनसंख्या ने देश की आधिकारिक जनसंख्या वृद्धि दर के अनुरूप बड़े पैमाने पर बढ़ने वाले रुझान दिखाए थे।

एक और अजीब प्रवृत्ति शहरीकरण की दर है जो 2011-12 से 2017-18 के दौरान लगभग ठप हो गई है। कई विश्वसनीय स्त्रोतों के अनुसार भारत में तेज़ी से शहरों का विकास किया जा रहा है। भारत के शहरीकरण की पुष्टि खुद नासा ने अपने उपग्रह द्वारा की है। तो क्या हम यह मान लें कि इतने अनुभवजन्य विश्वसनीय स्त्रोत गलत हैं?

वर्तमान बहस में कई तर्क दिए जा रहे हैं कि रोजगार सृजन कार्यबल की वृद्धि की तुलना में धीमी गति से हो रहा है। हालांकि 2011-12 के सर्वेक्षण के साथ PLFS की तुलना से पता चलता है कि 2011-12 के बाद से हर साल देश में 'एम्प्लॉयड' लोगों की संख्या 2 मिलियन की दर से घट रही है! यह पूरी तरह से किसी भी अन्य सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों से भिन्न है। उदाहरण के लिए, भारत की वास्तविक जीडीपी इस अवधि में 50% बढ़ी है। बुनियादी ढांचे से लेकर आवास तक, स्वास्थ्य सेवा से लेकर पेशेवर सेवाओं तक, आर्थिक विकास हर क्षेत्र में विस्तार के साथ आया है। यह समझ से बाहर है कि इस तरह की वृद्धि समवर्ती रूप से कार्यरत कर्मचारियों की संख्या में गिरावट के साथ कैसे हो सकती है? एक समय के लिए यह मान भी लिया जाए, तब भी इसका मतलब होगा कि उत्पादकता और पूंजी संचय पूरे भारत के विकास को चला रहा है। ब्रूकिंग्स की स्वतंत्र रिपोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि भारत में अत्यधिक गरीबी में रहने वाले लोगों की संख्या 2011 में 268 मिलियन से घटकर 50 मिलियन से भी कम हो गई है। यह बताना मुश्किल होगा कि अगर बेरोजगारी भी तेजी से बढ़ रही है तो ऐसी तेजी से गरीबी में रहने वाले लोगों की संख्या में कमी कैसे हो सकती है? 

अंत में, PLFS का बेरोजगारी में भारी उछाल का आंकड़ा विरोधाभासी लगता है जबकि विभिन्न रोजगार प्रकारों में कमाई का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। यदि श्रम बाजार की स्थिति उतनी ही खराब थी, जितनी बेरोजगारी दर बताती है, तो अर्थशास्त्र कम से कम स्थिर मजदूरी की उम्मीद करेगा।  उदाहरण के लिए, ग्रामीण महिलाओं की कमाई / मजदूरी, जिसके लिए बेरोजगारी दर विशेष रूप से अधिक है, जुलाई-सितंबर 2017 से शुरू होने वाली प्रत्येक तिमाही में लगातार बढ़ी है और अंतिम तिमाही तक क्रमशः 13% और 8% तक पहुंच गई है। यह स्पष्ट है कि पीएलएफएस के परिणाम पिछले ईयूएस के साथ तुलनात्मक नहीं हैं, और 2017-18 में बेसलाइन से परिवर्तनों को मापने के लिए पीएलएफएस का कड़ाई से उपयोग किया जाना चाहिए। हमने यह पहले भी देखा है कि भारत में सर्वेक्षण करना हमेशा अप्रत्याशित परिणाम उत्पन्न करने वाली कार्यप्रणाली में छोटे बदलावों के साथ मुश्किल रहा है। पीएलएफएस भी श्रम शक्ति भागीदारी (Labour Force Participation) दर में गिरावट को उजागर करता है। यदि यह सच है तो भी इसका कोई उल्लेख नहीं है कि यह अन्य कारकों जैसे स्कूल में उपस्थिति में वृद्धि और उच्च शिक्षा का परिणाम हो सकता है।

समस्या पद्धति के साथ है। इसका सैंपल साइज बहुत छोटा है जबकि तकनीक का इस्तेमाल कर ज़्यादा घरों तक पहुंचा जा सकता था। ग्रामीण इलाकों में सर्वेक्षण के अंदर रखे गए घर मात्र 55,000 थे। इसको देश के अंदर 160 मिलयन घरों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। इसका प्रतिशत निकालें तो पता चलेगा कि यह मात्र 0.03% है। अर्थात 10,000 घरों में मात्र 3 घरों को ही इसमें सम्मिलित किया गया है। घरों की सर्वेक्षण में हिस्सेदारी में भी देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि इसमें 75% झुकाव उन घरों पर किया गया है जहां 15 साल से बड़े सदस्य ने 10वी पास कर लिया था। वर्तमान में देखें तो इस परिदृश्य में पूरी संभावना है कि 15 साल के बाद भी उन्होंने अपनी पढ़ाई आगे जारी रखी होगी। यूँ कहें कि 15-18 साल की उम्र वाले समूह ने इससे आगे भी अपनी पढ़ाई जारी रखी होगी। अब जो अभी भी पढ़ाई कर रहे हैं उन्होंने इस सर्वेक्षण में तो यही जवाब दिया होगा कि वो आज भी नौकरी ढूंढ रहे हैं। शहरी परिवारों में प्रत्येक क्षेत्र में गलत उत्तर देने वाले एक परिवार में 25% की सीमा में श्रम बल की भागीदारी दर होगी। रियल टाइम डेटा के साथ सत्यापन का कोई स्रोत नहीं है। उपयोग किए गए सर्वेक्षणकर्ता आउटसोर्स एजेंसी से थे। जरूरी नहीं कि इस तरह की बातचीत के लिए वो सही व्यक्ति रहे हो। हालांकि इन सर्वेक्षणकर्ताओं को डेटा रिकॉर्डिंग के लिए एक टैबलेट प्रदान किया गया था, लेकिन उन्हें सिम और डेटा कनेक्टिविटी नहीं दी गई थी। यहां तक ​​कि स्थानों को भी अच्छे से निर्धारित नहीं किया गया था। आश्चर्य है कि आज की दुनिया में रियल टाइम डेटा और प्रौद्योगिकी का उपयोग नहीं किया गया था।

तो फिर भारत में रोजगार की सही तस्वीर क्या है? 

अब हमारे पास व्यापक डेटा उपलब्ध है, जो सामाजिक सुरक्षा लाभ में योगदान करने वाले लोगों को कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO), कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC) और राष्ट्रीय पेंशन निधि (NPS) के माध्यम से प्रदान किया जाता है। सितंबर 2017 और नवंबर 2018 के बीच, EPFO ​​में कुल 73,50,786 नए ग्राहक जोड़े गए, यानी हर महीने औसतन 4.9 लाख ग्राहक। ESIC भी एक ऐसी ही कहानी बताता है। सितंबर 2017 से नवंबर 2018 के बीच औसतन, हर महीने लगभग 10 -11 लाख ग्राहक जोड़े गए हैं। यहां तक ​​कि अगर हम ईपीएफओ डेटा के साथ 50% ओवरलैप मानते हैं, तो इससे लगभग 10 लाख श्रमिकों को प्रति माह औपचारिक कार्यबल में जोड़ा जाता है। यानी सालाना 1.2 करोड़। एनपीएस के विश्लेषण से पता चलता है कि हम केंद्र और सभी राज्य सरकारों में 6 लाख से ज़्यादा नौकरियां जोड़ रहे हैं।

रोजगार का एक और पूरक उपाय परिवहन क्षेत्र पर आधारित हो सकता है। वाणिज्यिक वाहनों की बिक्री पर विचार करें तो भारत में FY18 में निर्यात का लगभग 7.5 लाख वाहन बेचा गया। 25% की प्रतिस्थापन दर को ध्यान में रखते हुए यह अभी भी परिवहन क्षेत्र में जोड़े गए 5.6 लाख नए वाणिज्यिक वाहनों के बारे में बताता है। प्रत्येक वाणिज्यिक वाहन के लिए 2 लोगों के ऊपर रोजगार की क्षमता को मानते हुए, हम अनुमान लगा सकते हैं कि अकेले इस क्षेत्र में 11 लाख नौकरियां वार्षिक रूप से जोड़ी गयी हैं। इसमें अगर कारों, 3 व्हीलर्स और ट्रैक्टर्स की हुई भारी बिक्री को जोड़ दें तो इस क्षेत्र में 30 लाख से ज़्यादा नौकरियों का सृजन हुआ है।

स्वरोजगार भी भारत में रोजगार सृजन का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। पेशेवर सेवा प्रदाताओं जैसे चार्टर्ड एकाउंटेंट, वकील और डॉक्टरों के बीच नौकरी सृजन भी उनके संबंधित नियामक निकायों के आंकड़ों के अनुसार मजबूत है। आयकर (आईटी) डेटा नए स्वरोजगार पेशेवरों की संख्या पर एक संकेत प्रदान करता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, मूल्यांकन वर्ष (AY) 2014-15 और AY 2017-18 के बीच सालाना औसतन 1,50,000 कर भुगतान करने वाले पेशेवरों को जोड़ा गया। आगे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि इनमें से अधिकांश पेशेवर करदाता सहायक कर्मचारियों को नियुक्त करते हैं। यह बीस कर्मचारियों की सीमा से कम होने की संभावना है जो कि सामाजिक सुरक्षा पंजीकरण को अनिवार्य बनाता है। प्रत्येक पांच में से एक पेशेवर को कर्मचारी को काम पर रखने की संभावना देखते हुए कहा जा सकता है कि यह सालाना औसतन 7,50,000 नौकरियों के निर्माण का संकेत देता है। MUDRA Yojana के तहत 15.56 करोड़ ऋण में 7 लाख करोड़ से अधिक की राशि का वितरण किया गया है। 4 करोड़ से अधिक पहली बार उधारकर्ताओं ने अपने व्यावसायिक उद्यम शुरू किए हैं। छोटे उद्यमियों को दिए जा रहे ऋणों की इतनी बड़ी मात्रा ने लाभप्रद रोजगार पैदा किया है।

मैकिन्से ग्लोबल इंस्टीट्यूट के एक अध्ययन के अनुसार "India’s Labour Market- A New Emphasis on Gainful Employment” जिसमें सरकारी खर्चों में वृद्धि, स्वतंत्र कार्य और उद्यमिता में वृद्धि ने 2014-17 के लिए 20-26 मिलियन लोगों के लिए वृद्धिशील नौकरी को बढ़ावा दिया है। पर्यटन मंत्रालय के एक विश्लेषण के अनुसार, पर्यटन के क्षेत्र में हुए अध्ययन के बाद अकेले इस दौरान देश में 14.62 मिलियन रोजगार के अवसर पैदा हुए हैं। यद्यपि उपरोक्त आँकड़े रोजगार सृजन की पूर्ण सीमा को प्रस्तुत नहीं करते हैं, लेकिन वे देश भर में उत्पन्न होने वाले रोजगार की सीमा के अकाट्य और ठोस सबूत देते हैं। निश्चित रूप बेरोज़गारी के नैरेटिव में सिकुड़ते कार्यबल और बेरोज़गारी वृद्धि के सबूतों पर संदेह करने के पर्याप्त सबूत हैं। क्या इसका मतलब यह है कि भारत के पास रोजगार से जुड़ी कोई चुनौती नहीं है? यह भी सच नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में, भारत की अगली चुनौती उन लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करना है जो नौकरी कर रहे हैं लेकिन उच्च आय चाहते हैं। इसके लिए मौजूदा औद्योगिक कार्यबल के लिए और कृषि से बाहर निकलने के इच्छुक लोगों के लिए पर्याप्त भुगतान वाली नौकरियों के सृजन की आवश्यकता है। इसके लिए ऐसी नीतियों की आवश्यकता है जो देश में उत्पादकता वृद्धि को प्रोत्साहित करें, जिन्हें भारतीय अर्थव्यवस्था की औपचारिकता, शहरीकरण और औद्योगिकीकरण की दिशा में ठोस प्रयासों की आवश्यकता है। 

(अमिताभ कांत नीति आयोग के सीईओ हैं और विभिन्न मुद्दों पर अपनी राय रखते रहते हैं। उपरोक्त आर्टिकल बिज़नेस स्टैंडर्ड्स में छपे उनके लेख से लिया गया है)

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