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जानिये मोदी सरकार के दौरान नौकरियों को ले कर वह भ्रम जिसको 'ब्लैक आउट' मारने वाले पत्रकारों ने फैलाया

by IRC-ADMIN - Mar 11 2019 7:58PM

नौकरियों को लेकर हमारे देश के अंदर जितनी हाय तौबा मचाई जाती है और हर चुनाव के दौरान यह मुद्दा एक बहुत बड़े मुद्दे के रूप में सामने आता है, उसको देखने के बाद से यह साफ तौर पर पूरी जनता समझ चुकी है कि नौकरी का मुद्दा चुनावों में इस्तेमाल किया जाने वाला सबसे बड़ा मुद्दा है। इस मुद्दे को लेकर ना सिर्फ विपक्ष बल्कि सरकार भी हावी रहती है। अपने-अपने तर्क दिए जाते हैं। सरकार की तरफ से दावा किया जाता है कि उन्होंने रिकॉर्ड नौकरी दी है। विपक्ष की तरफ से यह दावा किया जाता है कि सरकार ने नौकरियां दी ही नहीं हैं। नौकरियों के अस्तित्व पर सवाल उठाते हुए तो दोनों ही तरफ की पार्टियां गुत्थम-गुत्था होती रहती हैं।

2014 के चुनावी परिवर्तन के बाद से जिस प्रकार से विभिन्न टीवी मीडिया चैनलों पर बैठकर बहुत ही शांतिप्रिय तरीके से बात करने वाले पत्रकारों की जबान अप्रत्यक्ष रूप से कटु हुई है, उसको देखने के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि 2014 में सत्तारूढ़ दल के समर्थकों द्वारा परिवर्तित हो चुकी सरकार के खिलाफ भारी रोष है। यह हमने 2014 से लगातार टीवी मीडिया चैनलों के स्टूडियो में देखा है। विभिन्न विशेषज्ञों द्वारा नौकरियों के सृजन को ले कर उसी तकनीक पर उंगलियां उठाई जाने लगती हैं जिस तकनीक को पिछले 10 सालों से संप्रग सरकार द्वारा इस्तेमाल किया जाता रहा है।

ऐसा ही हाल कुछ अखबारों का भी है। इन अखबारों के फ्रंट पेज ऐसी खबरों से रंगे पड़े हैं जो यह बताने का प्रयास करती है कि देश के अंदर नौकरियों की भारी गिरावट है। इन तथाकथित लिबरल पत्रकारों ने जिन एजेंसी का सहारा लेकर इस निष्कर्ष को निकाला है आज हम उन्हीं एजेंसियों के बारे में आपको बताने जा रहे हैं। यह भी स्पष्ट करेंगे कि आखिर मोदी सरकार के दौरान किस प्रकार से करोड़ो नौकरियों का सृजन हुआ है।

उससे पहले हम इन लिबरल पत्रकारों के कुछ तर्कों को समझ लेते हैं कि आखिर किन तर्कों के आधार पर इन लोगों ने नौकरी ना होने का निष्कर्ष निकाला है।

■ PLFS और CMIE का 'तर्कहीन' आधार -
हम इसकी शुरुआत करें, उससे पहले आपको नीति आयोग के CEO अमिताभ कांत के उस आर्टिकल की याद दिलाते हैं जिसमें उन्होंने लिखा था कि इस देश के अंदर नौकरियों की कमी एक समस्या नहीं है, बल्कि नौकरियों के डेटा की कमी एक बड़ी समस्या है। आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) के बारे में बात करते हुए उन्होंने लिखा था कि सरकार को इसके आंकड़े सार्वजनिक कर देने चाहिए। इसको विभिन्न शोधकर्ताओं को शोध के लिए दे देना चाहिए क्योंकि संभावना है कि यह आंकड़े नौकरियों के सृजन में अन्य संकेतकों के रूप में नहीं लिए जा सकते हैं। अर्थव्यवस्था के अंदर नौकरियों के सृजन के लिए इसका आधार लेना तर्कसंगत नहीं है क्योंकि इसका सैम्पल बहुत छोटा है। एक छोटे सैंपल को लेकर आप पूरे देश में रोज़गार सृजन का निष्कर्ष नहीं निकाल सकते हैं। अतः बेहतर यही होगा कि इसको विभिन्न शोधकर्ताओं के हाथ में दे कर इसकी कमियों को सार्वजनिक किया जाए ताकि उसमें सुधार लाया जा सके। अब आते हैं इसकी असल खामियों पर, जो प्रत्यक्ष रूप से स्पष्ट है।

प्रख्यात पत्रकारो द्वारा अपने अखबारों के जैसे लंबे लेख लिखे गए, उसका आधार इन्हीं दो एजेंसियों को बनाया गया है। उसमें तथ्यो की कमी स्पष्ट है क्योंकि उनका आधार ही एक 'अपर्याप्त सैम्पल' पर आधारित है जिसका आँकड़ा अभी भी संदेह के घेरे में है। सीधे रूप से कहें तो वह अपने पाठकों को भ्रमित करते हुए झूठी कहानी का निर्माण करते हैं।

विपक्ष द्वारा नौकरियों की कमी आलोचना का एक बड़ा विषय बनी है। आलोचना का एक बड़ा हिस्सा नौकरियों पर सीएमआईई के डेटा के आधार पर आया है। जबकि भारत में अधिकांश श्रम शक्ति सर्वेक्षणों का सैम्पल छोटा ही रहा है, लेकिन महत्वपूर्ण पहलू यह है कि क्या सीएमआईई अपनी सैंपलिंग तकनीक में बिना किसी आधार के निष्कर्ष दे रहा है? इसमें ईपीएफओ, एनपीएस और पीपीएफ जैसे सत्यापन योग्य और मजबूत डेटा सेट पूरी तरह से सम्मिलित नहीं किये गए हैं जो बहुत गंभीर सवाल खड़े करते हैं।

■ यह है नौकरियों की सच्ची तस्वीर -
अब हमारे सामने अहम सवाल पिछले पांच वर्षों में श्रम बाजार की वास्तविक सच्चाई है। अर्थव्यवस्था में रोजगार सृजन की स्थिति के बारे में विभिन्न पहलुओं पर ध्यान दिया जाना बहुत आवश्यक है नहीं तो इसका निष्कर्ष सही तरीके से नहीं निकलेगा। इसके लिए आपको हम शुजीत भल्ला के एक आर्टिकल को पढ़ने की सलाह देंगे जिसमें उन्होंने काफी गहराई से इसके बारे में बात की है। शुजीत भल्ला अपने आर्टिकल में लिखते हैं कि सरकार द्वारा 8.7 मिलयन वार्षिक नौकरियों के अनुमान सामने आया है। ध्यान रहे कि देश के भीतर सभी 'रोज़गार-बेरोज़गारी' सर्वेक्षण करने वाली एजेंसियां भी अनुमान के आधार पर ही आंकड़ों को रखती है। उनका विश्लेषण भी 100% सही नहीं कहा जाता। अपने लेख में वह वर्ष 2017-18 में 448 मिलियन के कुल रोजगार के अनुमान पर पहुँचते हैं। उनका अनुमान मजबूत लगता है क्योंकि यह अर्थव्यवस्था में रोजगार सृजन के वास्तविक परिदृश्य के करीब होने की संभावना दर्शाता है।
 
इसका अधिक सटीक अनुमान लगाने के लिए हमें नौकरियों की वास्तविक सच्चाई के बारे में गहराई से समझने की आवश्यकता है जिसके लिए संकेतों को आधार बनाया जाना चाहिए। इन्हीं संकेतों के आधार पर हम कोई निष्कर्ष निकाल सकते हैं। जैसा कि स्पष्ट है, डॉ. भल्ला और डॉ. दास ने एक अनुमान प्रदान किया है जो नौकरियों की सकारात्मक स्थिति को दर्शाता है। यह भी उजागर करना महत्वपूर्ण है कि ये अनुमान ईपीएफओ और एनपीएस डेटा का उपयोग करते हैं। दोनों ही नौकरी के विकास के बाद के प्रदर्शन में सकारात्मक रुझान दिखाते हैं। कुछ महीनों में ईपीएफओ डेटा में सुधार हुआ है। वास्तव में देखें तो 72.32 लाख नए ग्राहक सितंबर 2017 से दिसंबर 2018 तक कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) की सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में जोड़े गए हैं, क्योंकि औपचारिक क्षेत्र की नौकरियां दिसंबर में 16 महीने के उच्चतम स्तर 7.16 लाख पर पहुंच गई हैं। यह इंगित करता है कि डेटा में सकारात्मक परिवर्तन हुआ है इसलिए अर्थव्यवस्था के भीतर मजबूत रोजगार सृजन होना संभावित है।

■ ईपीएफओ की तर्कहीन आलोचना - 
इन तथाकथित लिबरल पत्रकारों द्वारा ईपीएफओ के उपयोग की एक आलोचना यह है कि यह नौकरियों के नए निर्माण के बजाय नौकरियों के अधिक औपचारिकीकरण का प्रतिनिधित्व करता है। लेकिन जो लोग इन आधारों पर ईपीएफओ डेटासेट की आलोचना करते हैं, उनका यह भी मानना ​​है कि विमुद्रीकरण (डिमोनेटाइज़ेशन) ने टैक्स कलेक्शन में सुधार नहीं किया है। स्पष्ट रूप से उनका तर्क असंगत है क्योंकि आधिकारिक डेटा बताते हैं कि नोटबंदी के बाद से टैक्स कलेक्शन में न सिर्फ सुधार हुआ है बल्कि ऐतिहासिक रूप से करदाताओं की संख्या बढ़ी है। वास्तव में ईपीएफओ डेटा नौकरियों के एक औपचारिक क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है और यह संभावना है कि कुछ अनौपचारिक नौकरियां औपचारिक बन सकती हैं, लेकिन 18-21 आयु वर्ग में नौकरियों में मजबूत वृद्धि से यह पता चलता है कि समय के साथ कर्मचारियों में ईपीएफओ ग्राहकों का उच्च अनुपात होना चाहिए। ईपीएफओ के नवीनतम आंकड़ों से पता चलता है कि 18-21 और 22-25 आयु वर्ग की श्रेणियों के लिए 4 मिलियन नौकरियों का सृजन हुआ है और इनमें से बड़ी संख्या उन लोगों की होनी चाहिए जो पहली बार इस कर्मचारी निधि से जुड़े हैं, अर्थात युवा हैं। ये नौकरियां औपचारिक नौकरियां हैं जो सभी सामाजिक सुरक्षा लाभों के साथ आती हैं इसलिए अर्थव्यवस्था में अच्छी और सभ्य नौकरियों का एक मजबूत निर्माण निश्चित रूप से हुआ है।

■ वाहन निर्माण में भी नौकरियों में वृद्धि -

नौकरियों के निर्माण के लिए मोहनदास पई में भी अपना विश्लेषण किया है। वाहन निर्माण के लिए मोहनदास पई और यश बैद के डेटा का उपयोग करके रोजगार सृजन का एक अन्य स्रोत सामने आता है, जहां उन्होंने पाया कि वित्त वर्ष 2018 में इस क्षेत्र ने 3.4 मिलियन नौकरियों का सृजन किया गया है और 31 दिसंबर, 2018 को समाप्त हुए 9 महीनों में 2.8 मिलियन नौकरियों का अतिरिक्त सृजन किया गया है। ऑटोमोबाइल सेक्टर तभी विकसित होता है जब ऑटोमोबाइल की मजबूत मांग होती है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास के लिए फिर से एक बहुत ही स्वस्थ संकेत है। वाहनों की यह मजबूत मांग आगे बताती है कि श्रम बाजार लगातार मजबूत बना हुआ है। बीते 4 वर्षों में 36 लाख बड़े ट्रक, कार इत्यादि खरीदे गए। इसके साथ ही 1.5 करोड़ कमर्शियल वेहिकल और 27 लाख से ज़्यादा नए ऑटो की बिक्री हुई है। एक अनुमान है कि ट्रांसपोर्ट सेक्टर में ही 4 साल में सवा करोड़ लोगों को नए अवसर मिले हैं।
 
एक अन्य संकेतक पर चलते हुए, 'एऑन हेविट सर्वेक्षण' बताता है कि 2018 में औसत वेतन वृद्धि 9.4% की रही है। यदि वास्तव में श्रम बाजार में बड़े पैमाने पर छंटनी देखी जाती थी और बेरोजगारी एक सर्वकालिक उच्च स्तर पर होती, तो स्पष्ट रूप से श्रम की आपूर्ति बढ़ जाती जो आय को कम देती थी। इसको सीधे शब्दों में समझे तो श्रम की आपूर्ति में बढ़त के साथ ही आय में वृद्धि दो परस्पर विरोधाभासी बातें हैं। इसके अतिरिक्त भारत में इस अवधि के लिए बहुत मध्यम मुद्रास्फीति देखी गई है। यहां तक ​​कि औसतन वास्तविक वेतन वृद्धि भी मजबूत और सकारात्मक है। इस प्रकार स्पष्ट रूप से अर्थव्यवस्था में नौकरियां होनी चाहिए। यही कारण है कि कंपनियां अपनी प्रतिभा को बनाए रखने के लिए उत्सुक हैं। वैसे भी कोई भी कंपनी अपनी प्रतिभा को अपनी प्रतिस्पर्धी कंपनी में नहीं जाने देना चाहती है।

देश में रोजगार की स्थिति को मापने के लिए Naukri.com जैसे प्रमुख ह्यूमन रिसोर्स प्लेटफ़ॉर्म भी अपने सूचकांक का निर्माण करते हैं। उनकी रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2017 की तुलना में मार्च 2018 में कंपनियों द्वारा काम पर रखने वाले लोगों में 3 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। डिजिटल स्पेस में ऐसे अनुमान हैं जो बताते हैं कि 2014-18 के बीच स्टार्ट-अप और डिजिटल अर्थव्यवस्था ने 3.9 मिलियन नौकरियों को भारतीय अर्थव्यवस्था में जोड़ा है। इसका मतलब सालाना 0.975 मिलियन नौकरियां इस क्षेत्र में बनी हैं।

यहां तक ​​कि हाल ही में CII लघु उद्योग (MSME) क्षेत्र के लिए अपने स्वयं के आँकड़ों के साथ सामने आया, जो भारत के गैर-कृषि श्रम बल के एक महत्वपूर्ण अनुपात को दर्शाता करता है। उनकी रिपोर्ट के अनुसार, पिछले चार वर्षों में MSMEs ने 14% अधिक नौकरियों का सृजन किया है। यह सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि दर में तेजी के साथ जुड़ा है जो भारतीय अर्थव्यवस्था ने पिछले कुछ वर्षों में अर्थव्यवस्था में निवेश चक्र के पुनरुद्धार के रूप में देखा गया है। रिपोर्ट में प्रति वर्ष कुल 13.5-14.9 मिलियन अतिरिक्त नौकरियों का अनुमान लगाया गया है। ये अनुमान पिछले पांच वर्षों में अर्थव्यवस्था में मजबूत रोजगार सृजन के संकेत देता हैं।

हालांकि, विभिन्न क्षेत्रों में अर्थव्यवस्था में पर्याप्त नौकरियां पैदा हो रही हैं, लेकिन चिंता का एक प्रमुख क्षेत्र उन लोगों के कौशल के बारे में है जो श्रम बल में प्रवेश कर रहे हैं। यदि योग्यता के अनुसार नौकरी नहीं प्राप्त हो पा रही है, तो यह चिंतित करता है। जबकि दूसरी तरफ सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि पर्याप्त श्रम मांग है। अब यह सुनिश्चित करने के लिए क्या किया जाना चाहिए कि लगातार स्किलिंग और रीस्किलिंग प्रयासों के माध्यम से श्रम आपूर्ति को बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण तेज़ी दिखे, इसके लिए अभी सरकार को माथापच्ची की आवश्यकता है। नीतिगत विकास की कुछ मात्रा पहले ही कौशल विकास (स्किल डेवलपमेंट अभियान) की ओर दी जा चुकी है और शायद बाद के वर्षों में हम भारत में पहले से कहीं अधिक मजबूत और गतिशील श्रम बाजार (लेबर मार्किट) देखेंगे।

■ सदन के पटल पर भी प्रधामंत्री मोदी खोल चुके हैं विपक्ष की पोल -
पिछले दिनों सदन के अंदर भी प्रधानमंत्री मोदी ने जब रोजगार के आंकड़े पर जवाब देना शुरू किया तो उन्होंने बताया कि तेजी से हाईवे का निर्माण हुआ है। विभिन्न शहरों में भी मेट्रो की परियोजनाएं शुरू हुई है। विभिन्न इलाकों में तो मेट्रो की परियोजना पूरी भी कर ली गई है। क्या उन क्षेत्र में नौकरियां नहीं बनी होंगी? वहां काम कौन कर रहा है? आगे बोलते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने होटल इंडस्ट्री की भी बात करते हुए कहा कि होटल इंडस्ट्री में भी अभूतपूर्व तेजी देखी गई है। होटल इंडस्ट्री में भी बड़े बदलाव देखने को मिले हैं। अप्रूव्ड होटलों की संख्या में 50% की वृद्धि हुई है।इसके साथ ही एयरपोर्ट निर्माण में भी बहुत तेजी के साथ कार्य हुआ है। क्या उन क्षेत्रों में काम करने वाले भारतीय नहीं है? इसके साथ ही हमारे देश के अंदर जहां केवल दो मोबाइल फैक्ट्रियां हुआ करती थी वहां अब 120 से भी ज्यादा मोबाइल फैक्ट्रियां बन चुकी हैं। क्या उन मोबाइल फैक्ट्रियों में बाहर से लोग आकर काम कर रहे हैं? बिल्कुल नहीं! वहां हमारे भारतीय ही काम कर रहे हैं। तो क्या यह नौकरियों के संकेत नहीं देते हैं?

हमारे देश में मार्च 2014 में करीब-करीब 65 लाख लोगों को नेशनल पेंशन स्कीम (NPS) में रजिस्टर किया गया था। पिछले साल अक्टूबर में यह संख्या बढ़कर के 1 करोड़ 20 लाख हो गई। अब यह बिना रोज़गार के ही हो रहा है क्या? इसके साथ ही हर साल इनकम टैक्स रिटर्न्स भरते समय नॉन-कॉर्पोरेट टैक्स पेयर्स जिनको खुद सैलरी नहीं मिलती है मगर अपने एम्प्लाई को नौकरी करने पर सैलरी देते हैं, उनकी बात प्रधानमंत्री ने सदन में रखी। पिछले साल ऐसे 6 लाख 35 हज़ार नए प्रोफेशनल्स जुड़े हैं। क्या आपको लगता है कि कोई डॉक्टर या कोई CA अपना प्रोफेशन शुरू करता है तो अपने नीचे कोई नौकरी नहीं देता होगा?

■ IRC विश्लेषण -
इन सभी आंकड़ों को देखने के बाद एक चीज स्पष्ट हो जाती है कि हमारे देश के अंदर नौकरियों की कोई कमी नहीं है। यदि कोई एक कमी है तो इन नौकरियों का आंकड़ा पेश करने वाली एजेंसियों की। गलती एजेंसियों की भी नहीं है क्योंकि उनकी भी एक सीमा है। वह एक सीमा के अंदर ही नौकरियों के सृजन का पता लगाने का प्रयास करती हैं। कम से कम किसी प्रकार की भी एजेंसी ना होने से बेहतर तो यही है कि कुछ आंकड़े पेश करने वाली एजेंसी हो। उसकी सटीकता को समय के साथ सही किया जा सकता है, लेकिन इन आंकड़ों को पूरी तरीके से एक फाइनल आंकड़ा मानकर लंबे लेख लिख लोगों को भ्रमित करना कहां तक सही है? जबकि इन आंकड़ों को देने वाली एजेंसियों के सेंपलिंग तकनीक में ही बड़ी खामी है।

इसके साथ ही यह भी देखना बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है कि विभिन्न क्षेत्रों में बढ़ रहे अवसर किस प्रकार की नौकरियों के नए अवसर निकालते हैं। क्योंकि संगठित क्षेत्र में बढ़ रही नौकरियां स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, लेकिन असंगठित क्षेत्रों में बढ़ रही नौकरियों का आंकड़ा मिल पाना बहुत मुश्किल होता है। अतः एक सच्चाई यह भी है कि हमारे देश में असंगठित क्षेत्र ही सबसे ज्यादा भागीदारी निभाता है। इसमें छोटी दुकान खोलकर काम करने वाला एक व्यक्ति से लेकर मुद्रा लोन लेकर अपना नया व्यापार शुरू करने वाला व्यक्ति शामिल है।

किसी भी प्रकार के निष्कर्ष पर आपको भरोसा करने से पहले इन सभी आंकड़ों को गहराई से समझना होगा क्योंकि हमारे देश के अंदर अब चुनावी माहौल गर्म हो चुका है। इस चुनावी माहौल के दौरान उस पूरे इकोसिस्टम ने अपनी धार पैनी कर ली है जिसने इतने वर्षों तक एक खास पार्टी की सेवा की है। आने वाले दिनों में आपको नौकरियों को लेकर ऐसे ही कई अखबार रंगे हुए नजर आएंगे,  लेकिन इन पर विश्वास करने से पहले आपको एक बार इन आंकड़ों की सच्चाई के बारे में भी जानना चाहिए। नहीं तो IRC तो आपको इसके बारे में अवगत कराता ही रहेगा।


इस मुद्दे पर हँसा हँसा के लोट-पोट कर देने वाले इस वीडियो को ज़रूर देखें 

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