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Politics - Elections 2019

आखिर क्यों "2019" भाजपा के लिए "2004" साबित नहीं होगा?

by IRC-ADMIN - Apr 12 2019 10:55AM

कांग्रेस की पूर्व अध्यक्षा और कांग्रेस पार्टी की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी का एक बयान आया। रिपोर्टर्स ने जब यह पूछा कि उनको क्या मोदी अजेय लगते हैं तो उनका जवाब था कि राजनीति में कोई अजेय नहीं होता। लगे हाथ मैडम ने देश को 2004 की भी याद दिला दी है। साफ है कि देश में आगे होने वाले राजनीतिक परिवर्तनों की सुगबुगाहट के पीछे सोनिया गांधी अपनी आवाज़ बुलंद कर के भाजपा के कार्यकर्ताओं को 2004 की याद दिला रही हैं। उनको लगता है कि अटल बिहारी बाजपेयी की हार एकबार फिर मोदी के साथ इतिहास में दोहराई जाने वाली है।

कांग्रेस का यह कहना कहाँ तक सही है इसके लिए कुछ तथ्यों और गौर करना होगा। देखना होगा कि कैसे 2019 एकबार फिर से 2004 नहीं बनने वाला है। देश में मोदी को जिताने के लिए जो कार्य भाजपा के कार्यकर्ता कर रहे हैं, वहां मात्र 44 सीटों पर सिमटी कांग्रेस की पूर्व अध्यक्षा का यह बयान कुछ हज़म नहीं हो रहा।

■ संगठन की शक्ति : 

भाजपा का संगठन इन 5 सालों में मज़बूत हुआ है। एक तरफ जहां 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी को हराने के लिए कई प्रकार के हथकंडे अपनाए गए, जहां भाजपा का संगठन थोड़ा सा पीछे रह गया। आज भाजपा के संगठन में वो शक्ति है कि इसने अपने दम पर 2017 में उत्तर प्रदेश का प्रचण्ड बहुमत दिलाया था। दूसरी तरफ भाजपा के विरोधी अभी भी संगठन के भीतर टिकट बंटवारे को ले कर असमंजस में दिखाई दिए। सीधी बात है कि जब किसी एक कैंडिडेट का टिकट कटता है तो दूसरा फिर से चढ़ बैठता है। यही उत्तर प्रदेश में भी देखने को मिला, बिहार में भी दिखा और बाकी राज्यों में भी देखने को मिल रहा है। भाजपा का संगठन 2004 से बहुत ज़्यादा मजबूत हुआ है।

भारतीय जनता पार्टी का संगठन शक्ति इन 5 सालों के अंदर बढ़ता हुआ दिखाई दिया है। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह द्वारा भारतीय जनता पार्टी के लिए सदस्यता अभियान चलाना और उसके साथ ही अधिक से अधिक लोगों को भाजपा के विचार से जोड़ना स्पष्ट रूप से भाजपा के संगठन शक्ति को बढ़ा गया। अभी भी इस चुनाव के अंदर करोड़ों ऐसे देशवासी हैं जो भारतीय जनता पार्टी के लिए वॉलिंटियर बने हुए प्रधानमंत्री मोदी के लिए वोट मांग रहे हैं।

■ परस्पर विरोधियों का गठबंधन :

कभी सांप और नेवले की दोस्ती नहीं हो सकती। यही बात महागठबंधन पर भी लागू होती है। तथाकथित महागठबंधन के नेताओं के बीच में जिस प्रकार की राजनीतिक कटुता इतिहास में देखी गई है वह किसी से छिपा हुआ नहीं है। ऐसी राजनीति कटूता को देखने के बाद इनका एक साथ आना कार्यकर्ता स्तर पर भी दोनों के संगठन को साथ लाएगा। यह कहना बहुत मुश्किल है। 2014 के अंदर यदि देखा जाए तो मोदी की जो लहर चली थी वह 2019 के अंदर कम होने की बात कही जा रही है। यह तब है जब मोदी द्वारा चलाए गए जन हितेषी योजना की पूरी लिस्ट इन 5 सालों में जमीन तक पहुंचाई गई है। इस महागठबंधन के पीछे भी यही डर है। परस्पर विरोधियों का महागठबंधन स्पष्ट रूप से उनको कैमरा के सामने भले ही मजबूत दिखाएं लेकिन जमीनी स्तर पर इनका वोट बैंक एक दूसरे को ट्रांसफर हो पाएगा या नहीं यह कहना मुश्किल है। 2004 के अंदर ऐसी स्थितियां नहीं थी। 2004 के अंदर भी उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी ने ठीक-ठाक प्रदर्शन किया था।लेकिन इस बार बदले समीकरण को देखने के बाद से यह स्पष्ट हो जाता है की परस्पर विरोधियों के बीच में इतनी मित्रता प्रासंगिक नहीं लगती। सोनिया गांधी जी 2004 की याद दिला रही हैं, उनको यह समझना होगा कि उस समय कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनने की ओर अग्रसर हो रही थी। अटल बिहारी वाजपेई उस समय की सबसे लोकप्रिय नेता थे लेकिन कांग्रेस के साथ गठबंधन कर केंद्र में सरकार बनाने का दावा पेश करने वाले जो दल उस समय कांग्रेस के साथ खड़े थे वह इस समय कांग्रेस से पीछा छुड़ा रहे हैं। चाहे वह मायावती हो, शरद यादव हो, शरद पवार हो या फिर मुलायम सिंह यादव, इस समय कांग्रेस को एक डूबते जहाज के रूप में उनके विपक्षी भी देख रहे हैं। यद्यपि इस तथाकथित महागठबंधन का गोत्र कांग्रेसी ही है लेकिन फिर भी 2004 जैसे हालात बने बेहद मुश्किल है।

■ सोशल मीडिया :

2014 के अंदर जो सोशल मीडिया एक निर्णायक शक्ति बनकर उभरा, वह 2019 के अंदर भी वैसा ही होता हुआ दिखाई दे रहा है। सोशल मीडिया सबसे तेजी से लोगों के मोबाइल स्क्रीन पर पहुंचने वाला एक स्रोत है। जिससे कम समय में बड़े क्षेत्र को टारगेट किया जा सकता है। केंद्र सरकार की योजनाओं को लोगों तक पहुंचाया जा सकता है। इस सोशल मीडिया के ऊपर कांग्रेस पार्टी भले ही विश्वास ना करती हो लेकिन अब कांग्रेस पार्टी भी सोशल मीडिया का बढ़ चढ़कर इस्तेमाल कर रही है, लेकिन यह पूरा इलाका इस समय पर भी भारतीय जनता पार्टी द्वारा प्रभावित है। भारतीय जनता पार्टी के सोशल मीडिया की ताकत अभी भी सबसे मजबूत है। 2014 के अंदर यह सोशल मीडिया की ताकत नहीं थी। उस समय इंटरनेट का उतना प्रचलन भी नहीं था और स्मार्टफोन का ना होना उसमें और अधिक परेशानी का विषय था। लेकिन अब तेजी से हो रहे डिजिटलाइज़ेशन के कारण हर एक व्यक्ति के पास उसका स्मार्टफोन है। जो स्पष्ट रूप से उसे सोशल मीडिया से जोड़ता है। सरकार की पहुंचाई जा रही योजनाओं का लाभ और उसका लेखा-जोखा अब लोगों के मोबाइल स्क्रीन पर पहुंच जा रहा है। दुर्भाग्यवश अटल बिहारी वाजपेई के पास ऐसा संसाधन नहीं था लेकिन आज नरेंद्र मोदी और अमित शाह के पास यह संसाधन है जो भारतीय जनता पार्टी को एक बढ़त दिलाता है।

■ संगठन का विस्तार : 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने सिर्फ हिंदी हार्ट लाइन जैसे मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ पर ही अपना ध्यान केंद्रित नहीं किया बल्कि इसने भारतीय जनता पार्टी के परंपरागत वोट बैंक को बढ़ाते हुए उन क्षेत्रों में भी अपना प्रभाव और वर्चस्व बनाने का प्रयास किया जहां भारतीय जनता पार्टी का कोई अस्तित्व नहीं था। इसी दौरान त्रिपुरा के अंदर भारतीय जनता पार्टी की प्रचंड बहुमत की सरकार यह बता गई कि भारतीय जनता पार्टी का संगठन कितना मजबूत हो चुका है। इसका विस्तार कितना अधिक बढ़ चुका है।

पश्चिम बंगाल के अंदर भारतीय जनता पार्टी इस समय नंबर दो की पार्टी बन चुकी है। दूसरी तरफ पूर्वोत्तर भारत के अंदर भी भारतीय जनता पार्टी के लिए लोगों का समर्थन सामने आया है। आसाम के अंदर भारतीय जनता पार्टी की सरकार उसी का उदाहरण पेश करती है। ऊपर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विश्वसनीय चेहरा स्पष्ट रूप से प्रधानमंत्री के पद के लिए उनकी दावेदारी को मजबूत करता है। 2004 के अंदर अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी का संगठन मात्र हिंदी हार्ट लाइन पर ही विश्वास करता था। एक गठबंधन की सरकार चलाने के बाद अटल बिहारी वाजपेई के पास उतनी राजनीतिक शक्ति नहीं थी जितनी एक प्रचंड बहुमत के साथ आये नरेंद्र मोदी के पास थी। इसका इस्तेमाल मोदी ने भरपूर किया है। संगठन की शक्ति को बढ़ाते हुए उसका विस्तार अमित शाह द्वारा किया गया है। अमित शाह ने पुराने कार्यकर्ता होने के नाते संगठन की शक्ति को बेहतर तरीके से पहचाना है। भारतीय जनता पार्टी को सही मायने में देशव्यापी पार्टी बना दिया है। भारतीय जनता पार्टी दक्षिण भारत में भी है। उत्तर भारत में भी है। पश्चिमी भारत में भी है और पूर्वी भारत में भी है। यानी पूरब पश्चिम और उत्तर दक्षिण... चारों तरफ भारतीय जनता पार्टी का संगठन मौजूद है। जो प्रधानमंत्री मोदी की दावेदारी 2019 में और मजबूत करता है। वस्तुतः भारतीय जनता पार्टी कुछ क्षेत्रों में अभी भी कमजोर है। लेकिन वहां भी संगठन को मजबूत करने का कार्य हो रहा है और आने वाले समय में भारतीय जनता पार्टी का वह मजबूत होना कांग्रेस की समाप्ति की एक राजनीति घोषणा होगी।

■ चुनाव पूर्व गठबंधन :

2004 में जहां चुनावों से पहले किसी बड़े महागठबंधन की कोई चर्चा नहीं थी। 2019 में पहले से ही महागठबंधन के आधार पर ही मोदी को हराने का पूरी योजना तैयार हैं। इसने भारतीय जनता पार्टी को महागठबंधन के अनुसार नीतियां और राजनैतिक समीकरण बैठाने में सहायता की है। अटल बिहारी वाजपेई जहां लोकतंत्र पर विश्वास करने वाले व्यक्ति थे दूसरी तरफ कांग्रेस ठीक इसके उलट सिर्फ राजतंत्र पर विश्वास करने वाली पार्टी है। नरेंद्र मोदी के समक्ष महागठबंधन ने स्पष्ट रूप से नरेंद्र मोदी और अमित शाह को उस अनुसार राजनीतिक समीकरण बैठाने में सहायता करते हुए उनको एक स्पष्ट राजनीतिक ज़मीन और दिशा दिखाई। जिस वोट बैंक के आधार पर महागठबंधन भारतीय जनता पार्टी को हराना चाहता है उसकी कारट अमित शाह ने बहुत पहले ही ढूंढ ली थी। चुनाव पूर्व महा गठबंधन यह भी बता रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी से किस प्रकार का डर देश के नेताओं को है। इससे देश के अंदर एक संदेश यह भी जा रहा है कि एक व्यक्ति को हराने के लिए वह परस्पर विरोधी भी साथ आ गए हैं जो कभी एक दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाते थे। यह सहानुभूति का वोट भी प्रधानमंत्री मोदी को ही मिलेगा।

■ इकोसिस्टम :

राजनीति में कांग्रेस पार्टी ने 70 साल राज करने के बाद एक इको सिस्टम बनाया था। 2004 के दौरान अटल बिहारी वाजपेई के समर्थन में यह इकोसिस्टम सामने नहीं था। इकोसिस्टम होने का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि हवा ना होते हुए भी आप अपनी तरफ एक हवा बना सकते हैं। कांग्रेस पार्टी ने यही किया था। उसके समर्थन में तथाकथित सेक्युलर पत्रकार बॉलीवुड और अन्य कई लोग सामने आ गए थे। जिसने कांग्रेस पार्टी को 2004 के दौरान एक 'एज' प्रदान किया था। उस इकोसिस्टम की काट नरेंद्र मोदी ने भी इकोसिस्टम बनाकर दी। आज विभिन्न ऐसे चैनल है जिनको भारतीय जनता पार्टी द्वारा एंडोर्स चैनल बताया जाता है। प्रधानमंत्री मोदी ने मनोरंजन इंडस्ट्री से लेकर खबरों के बाजार तक में अपनी पकड़ बनाई है। इसमें कांग्रेस पार्टी द्वारा बनाए गए उस बड़े इकोसिस्टम को एक बड़ा तगड़ा झटका दिया है। जिसके आधार पर वह 2019 में वापस आने की सोच रही थी। अभी हाल ही में 600 फिल्म निर्माताओं द्वारा प्रधानमंत्री मोदी को वोट ना देने की अपील के खिलाफ देश के 900 बड़े लोगों ने प्रधानमंत्री मोदी के समर्थन में वोट देने का आग्रह देश की जनता से किया है। यह उसी को सिस्टम को एक जवाब है।

कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने किस आधार पर ऐसी बात कही है, यह तो वही जाने, लेकिन देश के अंदर जिस एक राजनीतिक घमंड को कांग्रेस पार्टी ने इतने साल अपने साथ रखते हुए देश की राजनीतिक विरासत को कलंकित किया है, उसको देखने के बाद अब शायद ही देश का कोई देशभक्त कांग्रेस को वोट दें, लेकिन आने वाले समय में आप 2004 वाली गलती दोबारा न दोहराए। इसके लिए एक बार फिर हम आपको प्रधानमंत्री मोदी के पक्ष में वोट डालने की अपील करते हैं। याद रखिए कि अवसरवाद के समक्ष आज नरेंद्र मोदी ही खड़े हैं। यह अवसरवादी नेता कल फिर एक-दूसरे से अलग होकर देश को ब्लैकमेल करेंगे लेकिन एक मजबूत सरकार देने के लिए नरेंद्र मोदी का होना बहुत आवश्यक है। भारतीय जनता पार्टी को वोट देकर देश के केंद्र में एक मजबूत सरकार को बैठाने में सहायता करें क्योंकि जिस अवसरवादिता को हम इन पार्टियों के नेताओं में देख रहे हैं वह हमारे देश के लिए बिल्कुल अच्छी बात नहीं।

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